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सिद्धार्थनगर

छुट्टा पशु, संवेदना की कमी और जिम्मेदारी से भागता सिस्टम

 नगर पंचायत बढ़नी के रेलवे स्टेशन गेट संख्या–2 पर एक छुट्टा पशु गंभीर अवस्था में स्थानीय लोगों द्वारा देखा गया। पशु की हालत देखकर लोगों ने तुरंत पशु चिकित्सक को सूचना दी। सूचना मिलते ही स्थानीय नागरिक मौके पर पहुंचे, जहां पशु चिकित्सक ने प्राथमिक उपचार के तौर पर इंजेक्शन दिया। ठंड से राहत दिलाने के उद्देश्य से स्थानीय लोगों ने पशु के ऊपर बोरा डालकर उसे ढक दिया। यह दृश्य एक बार फिर यह सवाल खड़ा करता है कि क्या संवेदनशीलता अब सिर्फ आम नागरिकों तक ही सीमित रह गई है? घटना की जानकारी नगर पंचायत के अधिशासी अधिकारी (ईओ) को भी दी गई, लेकिन अफसोसजनक रूप से स्थिति जस की तस बनी रही। न कोई स्थायी व्यवस्था, न कोई त्वरित कार्रवाई। छुट्टा पशुओं की यह समस्या नई नहीं है। कभी चारे के अभाव में, कभी सड़क दुर्घटनाओं में, कभी दवा न मिलने से तो कभी भीषण ठंड में ये बेजुबान पशु दम तोड़ देते हैं। सवाल यह है कि आखिर कब तक यह सिलसिला यूं ही चलता रहेगा? जिनके कंधों पर इन पशुओं की देख- रेख और सुरक्षा की जिम्मेदारी है, वे अपनी जिम्मेदारी से क्यों भाग रहे हैं? विडंबना यह है कि चुनाव आते ही छुट्टा पशु एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन जाते हैं। घोषणाएं होती हैं, वादे किए जाते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही यह मुद्दा भी फाइलों में दफन हो जाता है। धरातल पर न गौशालाओं की समुचित व्यवस्था दिखती है, न चारे, दवा और ठंड से बचाव के लिए कोई ठोस योजना।आज जरूरत है केवल बयानबाजी नहीं, बल्कि ठोस और स्थायी व्यवस्था की। नगर पंचायत, पशुपालन विभाग और प्रशासन को मिलकर यह तय करना होगा कि इन बेजुबान पशुओं की जान यूं ही लापरवाही की भेंट न चढ़े। जब आम नागरिक मानवता दिखा सकते हैं, तो जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग अपनी जिम्मेदारी क्यों नहीं निभा सकते? यह घटना सिर्फ एक पशु की पीड़ा की कहानी नहीं, बल्कि हमारे सिस्टम की संवेदनहीनता का आईना है। अब भी समय है कि जिम्मेदार जागें, वरना सवाल यही रहेगा—कब तक छुट्टा पशु यूं ही मरते रहेंगे और व्यवस्था तमाशबीन बनी रहेगी?

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