किसी भी बात के कई अर्थ होते हैं। सब कुछ निर्भर करता हैं-अपने सोचने के ढंग पर। सबकी अलग-अलग सोच हैं। स्वभाव के अनुसार अलग-अलग भावना हैं। एक ही विशय को हम अपने सोचने की ढंग से अपने अनुकूल भी बना सकते हैं और प्रतिकूल भी। हमारे सोचने की ढंग अर्थ को बदल देता हैं, उन्हें नया अर्थ देता हैं।
एक छोटी-सी कहानी इस बात को स्पश्ट करती हैं। एक बार मनुश्य और देवता और असुर ब्रह्मा जी के पास पहुँचे। तीनों ने उपदेश देने की प्रार्थना की। ब्रह्मा जी के मुँह से केवल एक अक्षर निकला-‘द’। उन्होंने इस अक्षर का अर्थ सबसे पहले मनुश्य से पूछा- ‘हमें संग्रह की प्रवृत्ति से मुक्त रहकर, दान करते रहने की शिक्षा मिली हैं’। देवराज इन्द्र बोले-आपने ‘द’ कहकर हमें और इन्द्रिय-दमन का उपदेश दिया हैं।
असुर बोले-‘द’ का अर्थ हैं हमें हिंसक प्रवृत्ति को त्यागकर प्राणीमात्र पर दया करने की भावना अपनायें। सृष्टि के पालनहारकर्ता ब्रह्मा तीनों के उत्तर से प्रसन्न हुए। एक ही अक्षर के तीन-तीन अर्थ निकल आये। तीन अर्थ, तीन पृथक-पृथक सोचने के ढंग के प्रमाण थे।
‘भावना दिन-रात मेरी, सब सुखी संसार रहे।
सत्य, संयम, शील का, व्यवहार बारम्बार रहे।’
सदाचार मैं जीवन अपना, देशभक्ति मैं हर व्यवहार।
संस्कारों की ज्योति जलाकर,
आलोकिक कर दे संसार ।।
देशधर्म की सेवा ही हैं’
मानव के जीवन का सार।
जिसमें यह संस्कार न आया’
वह तो निरा भूमि का भार ।।
एक अन्य प्रसंग हैं। देवर्शि नारदजी भगवान श्री कृश्ण के पास गये।
उनके मन में एक शंका थी। बोले-‘आपको दुर्योधन से अधिक युधिश्ठिर क्यों प्रिय हैं ? ऐसा क्या हैं उसमें ?’
श्री कृश्ण ने दोनो राजकुमारों को बुलावाया। उन्होंने युधिश्ठिर से कहा-‘कहीं से एक ऐसा आदमी ढूँढ़कर लाओ जो तुम्हारी दृश्टि में सबसे बुरा हो’ युधिश्ठिर चले गये। दुर्योधन के आने पर बोले- ‘गांधारी नंदन ! तुम कोई ऐसा आदमी पकड़ कर लाओ, जो सभी दृश्टियों से अच्छा हो।’ दुर्योधन भी चला गया।
कुछ समय बाद युधिश्ठिर अकेले लौटे। श्री कृश्ण ने पूछा, ‘क्या हुआ? बुरा आदमी कहाँ हैं ? युधिश्ठिर ने कहा ‘मुझे ऐसा कोई आदमी न मिला, जिसमें कोई अच्छा न हो।’ दुर्योधन भी अकेले ही वापस लौटा। बोला-मैंने ऐसा कोई आदमी नहीं पाया जिसमें कोई बुराई न हो।’ नारद को अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया। दोंनो की सोच का अन्तर वे अच्छी तरह जान गये।
महात्मा शेखसादी के जीवन का एक रोचक प्रसंग हैं। वे प्रतिदिन मस्जिद में नमाज पढ़ने जाते थे। उनके पैरों में फटे जूते होते थे। एक दिन एक धनी व्यक्ति नमाज पढ़ने आया। उसके कीमती जूतों को देखकर शेखसादी सोचने लगे यह महीने में एक बार नमाज पढ़ने आता हैं, मगर अल्लाह ने इस पर कृपा करके, इसे हर
रह से सम्पन्न बना दिया हैं। मैं नियमित नमाज पढ़ता हूँ, फिर भी फटे-जूते पहनते ही मेरी जिन्दगी कट गई। ज्या यही अल्ला का इंसाफ है ?’
शेखसादी सोच में ही डूबे हुए थे कि एक अपंग व्यक्ति बैसाखियों पर चलता हुआ मस्जिद में आया। उसकी एक टांग नहीं थी। शेखासादी ने उसे देखा तो उनके मन में नये विचार आये। वे सोचने लगे-‘यह बेचारा एक पैर खो चुका हैं। मेरे दोनो पैर सलामत हैं। क्या यह अल्लाह की मेहरबानी नहीं हैं?’ सोचने का ढंग बदलते श्री शेखसादी के मन में अल्लाह के प्रति जो भावना उत्पन्न हुई थी, वह बदल गई।
ईसा मसीह को एक दुराचारी व्यक्ति ने भोजन का निमंत्रण दिया। वह दौलत मन्द था। ईसा ने वह निमंत्रण स्वीकार कर लिया। ईसा के भक्तों को जब यह बात मालूम हुई तो वे बहुत दुःखी हुए। भक्तों की भीड़ ईसा के पास पहुँची। एक बूढ़े ने कहा-‘जिस दुराचारी के यहाँ आप जा रहे हैं, उससे घृणा करते हैं। उसका अन्न ग्रहण करना आप जैसे पवित्र पुरुश के लिये उचित नहीं हैं।
महात्मा ईसा मसीह मुस्कुराये। बोले- ‘स्वस्थ व्यक्ति के पास जाता हैं या बीमार के पास ? माना कि वह आदमी दुराचारी हैं, किन्तु उससे दूर भागकर उसे अच्छा नहीं बनाया जा सकता। बुराई से घृणा करो, बुरे लोंगो से नहीं। बुरे लोंगो को अच्छा बनाने के लिये उनके सम्पर्क में आना जरुरी हैं। उनके साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार करो, उनको अपनी अच्छाइयों से प्रभावित करो और उनके दुर्गुणों से अपने आपको दूर रखो।’
ईसा का सोचने का ढंग कितना निराला था। सोचने का ढंग किसी बात, किसी काम, व्यवहार का अर्थ बदल देता है, इसे प्रमाणित करने वाली घटनाओं और कथाओं की कमी नहीं हैं।
बालमुकुन्द त्रिपाठी
सम्प्रति-वरिष्ठ पत्रकार
अंतिम इच्छा
एक शराबी मृत्यु शैया पर था तभी उसके सामने भगवान प्रकट हुए। भगवान बोले-तुम्हारी कोई अंतिम इच्छा हो तो बताओ? शराबी बोला-प्रभु अगले जन्म में दांत चाहे एक देना पर लिवर पूरे बत्तीस देना।
मुसाफिर अगर अपनी हिम्मत न हारे कदम चूम लेती है खुद आके मंजिल
