आज संसद में वरिष्ठ सांसद जगदंबिका पाल ने जनभावनाओं से जुड़े दो महत्वपूर्ण विषयों को प्रभावी ढंग से उठाया
प्रथम, श्री पाल ने नियम 377 के अंतर्गत भोजपुरी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने की पुरजोर माँग की। उन्होंने सदन को अवगत कराया कि वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार लगभग 6 करोड़ भारतीय भोजपुरी को अपनी मातृभाषा के रूप में बोलते हैं। यह भाषा उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और झारखंड सहित अनेक राज्यों में व्यापक रूप से प्रचलित है, साथ ही मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद एवं टोबैगो तथा गुयाना जैसे देशों में भी प्रवासी भारतीयों के बीच इसकी सशक्त उपस्थिति है। उन्होंने कहा कि इतनी समृद्ध भाषाई एवं सांस्कृतिक विरासत के बावजूद भोजपुरी को अभी तक संवैधानिक मान्यता प्राप्त नहीं होना दुर्भाग्यपूर्ण है। श्री पाल ने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल कर करोड़ों भोजपुरी भाषियों की लंबे समय से चली आ रही माँग को सम्मान दिया जाए। द्वितीय, श्री पाल ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी रुर्बन मिशन से संबंधित एक महत्वपूर्ण अनुपूरक प्रश्न उठाते हुए सरकार से आकांक्षी जिलों के संदर्भ में स्पष्टता माँगी। उन्होंने प्रश्न किया कि इन जिलों में रुर्बन क्लस्टरों के चयन हेतु क्या विशेष मानदंड अपनाए गए हैं तथा क्या उन्हें प्राथमिकता देने के लिए कोई अलग रणनीति बनाई गई है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी जानना चाहा कि क्या सरकार ने आकांक्षी जिलों में रुर्बन क्लस्टरों के माध्यम से आय, रोजगार और बुनियादी सेवाओं में वास्तविक एवं मापनीय सुधार का आकलन किया है। यदि अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हुए हैं, तो उन्हें सुधारने के लिए सरकार द्वारा क्या ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। जगदंबिका पाल ने कहा कि संसद के माध्यम से इन मुद्दों को उठाना न केवल सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण बल्कि समावेशी एवं संतुलित क्षेत्रीय विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है।
